नागा साधुओं का अखाड़ा शब्द कहां से निकला, मुगल काल से है कनेक्शन

R. S. Mehta
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महाकुंभ या कुंभ में सबसे पहले स्नान के लिए साधुओं की एक टोली आती है. शरीर पर धुनि और राख लिपटी हुई होती है. माथे पर टीका. कुछ दिगंबर होते हैं तो कुछ श्रीदिगंबर. यानि कुछ बिना कपड़ों के होते हैं तो कुछ ने बस छोटा सा लंगोट पहना होता है. उनके स्नान करने के बाद महिला साधुओं की टोली स्नान करती है. वो महिलाएं भी सिर्फ तन पर दंती लपेटे हुए होती हैं. यानि बिना सिला कपड़ा. इन सभी को नागा साधु कहा जाता है. ये लोग सिर्फ आपको कुंभ मेले में ही दिखेंगे. फिर वापस लौट जाते हैं

नागा साधुओं का जीवन रहस्यमयी रहा है, लोगों को कभी नहीं पता चलता कि नागा महाकुंभ में कैसे आते हैं और महाकुंभ खत्म होने के बाद कहां गायब हो जाते हैं. हालांकि कुछ लोगों का मानना है कि नागा साधु रात के समय खेत-पगडंडियों का सहारा लेकर जाते हैं, लेकिन इसके कोई पुख्ता सबूत नहीं मिले.

महामंडलेश्वरों के मुताबिक, ये नागा प्रयागराज, काशी, उज्जैन, हिमालय के कंदराओं और हरिद्वार में कहीं दूर-दराज इलाकों में निवास करते हैं. जो ज्यादातर समय तप करते हुए बिताते हैं.

13 अखाड़े, 7 में ट्रेनिंग

कहा जाता है कि नागा साधुओं की ट्रेनिंग किसी कमांडो ट्रेनिंग से ज्यादा खतरनाक होती है. जो व्यक्ति नागा साधु बनना चाहता है उसकी महाकुंभ, अर्द्धकुंभ और सिहंस्थ कुंभ के दौरान साधु बनने की प्रक्रिया शुरू की जाती है. नागा साधुओं के कुल 13 अखाड़े हैं, जिनमें से कुल 7 अखाड़े ही ऐसे ही जो नागा संन्यासी की ट्रेनिंग देते हैं, जिनमें, जूना, महानिर्वाणी, निरंजनी, अटल, अग्नि, आनंद और आह्वान अखाड़ा हैं.

कहां से आया अखाड़ा शब्द?

लेकिन क्या आप जानते हैं ये अखाड़ा शब्द आया कहां है. कुछ जानकारों के मुताबिक, अखाड़ा शब्द मुगल काल से ही शुरू हुआ है. इसके पहले साधुओं के जत्थे को बेड़ा या जत्था ही कहा जाता था. अखाड़ा साधुओं का वह दल होता है जो शास्त्र विद्या में पारंगत होता है और एक जैसे नियमों का पालन कर तप करता है.

नागा एक पदवी

नागा दरअसल एक पदवी ही होती है. साधुओं में वैष्णव, शैव और उदासीन तीन सम्प्रदाय होते हैं. इन सम्प्रदायों के अंदर भी कई सारे विभाजन होते हैं. जैसे दिगंबर, निर्वाणी और निर्मोही तीनों ही वैष्णव संप्रदाय के हैं. इन तीनों सम्प्रदायों को मिलाकर कुल 13 अखाड़े हैं. इन सभी अखाड़ों से नागा साधु बनाए जा सकते हैं.

नागा साधुओं को सार्वजनिक तौर पर नग्न होने की अनुमति होती है. वो तपस्या के लिए अपने कपड़ों का त्याग कर सकते हैं. नागा में बहुत से वस्त्रधारी और बहुत से दिगंबर यानी निर्वस्त्र होते हैं. अधिकतर निर्वस्त्र नागा साधु शैव अखाड़े से आते हैं. हर अखाड़े के साधुओं का स्वभाव अलग होता है और उनके नियम भी अलग ही होते हैं. कई लोगों का मानना है कि नागा का अर्थ नग्न से ही लगा लेते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है. वस्त्रधारी भी नागा साधु हो सकते हैं.

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