ब्राह्मण से कैसे बने शीन काफ निजाम, कहानी शिवकिशन बिस्सा की

R. S. Mehta
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भारत सरकार ने देश दुनिया में शीन काफ निजाम के नाम से मशहूर उर्दू के विख्यात शायर शिवकिशन बिस्सा को साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र पद्मश्री देने की घोषणा की है. उनका जन्म जोधपुर के कल्लों की गली में गणेश दास बिस्सा के घर 26 नवम्बर 1945 को हुआ था. मूलत जोधपुर के रहने वाले बिस्सा बिजली विभाग से सेवानिवृत हैं. उर्दू के साथ साथ उनकी फारसी पर भी गहरी पकड़ है. देश में उर्दू और फारसी साहित्य पर उनको अथॉरिटी की रूप में देखा जाता है.

शिवकिशन बिस्सा जिस नाम से विख्यात हुए हैं. उसे सुन कोई नहीं कह सकता कि वो एक पुष्करणा ब्राह्मण है. बचपन में उनकी शिक्षा भी संस्कृत में हुई, लेकिन समय के साथ उर्दू भाषा और साहित्य में रूचि के कारण उन्होंने अपने नाम को ही उर्दू में ढाल लिया. वह एस के बिस्सा लिखते थे. उर्दू में एस को शीन और के को काफ कहते हैं. निजाम उनका ‘तखल्लुस'(शायर का उपनाम) है. ऐसे उनका नाम ‘शीन काफ निजाम’ हुआ. निजाम भारत ही नहीं दुनिया के कई देशों में मुशायरे कर चुके हैं. उनके कई मुशायरे और शायरियां लिखी और पढ़ी जाती हैं.

बिस्सा ने अपना नाम निजाम क्यों रखा?

निजाम साहब की शायरी सुन कोई यह नहीं कह सकता कि वह ब्राह्मण परिवार से आते है. ब्राह्मण परिवार से आने वाले शिवकिशन बिस्सा को किशोर अवस्था में ही उर्दू भाषा से लगाव हो गया था. ऐसे में उन्होंने 17 साल की उम्र में अपना नाम शीन काफ निजाम रख लिया. निजाम बताते हैं कि उन्होंने इस नाम के पीछे ज्यादा विचार नहीं किया. उस समय यह नाम अच्छा लगा, तो उन्होंने रख लिया. वह बताते हैं कि काव्य परंपरा भी होती है. उर्दू की परंपरा यह है कि आदमी अपने माता पिता द्वारा दिए नाम से नहीं लिखता है. हर भाषा का और उसके अंदर जो काव्य है. उसका अलग रूप पहचान और संस्कार होती है. जब मैं उर्दू में लिखने लगा तो मुझे लगा मेरा भी एक ‘तखल्लुस’ होना चाहिए, जब मैंने शुरू किया तो इतनी समझ नहीं थी. उस समय मुझे निजाम नाम अच्छा लगा, मैंने रख लिया.

जो आप करना चाहते हैं वही करें

निजाम बताते हैं कि यह नाम रखने पर माता-पिता नाराज तो नहीं हुए, लेकिन उन्होंने कहा कि यह किस तरह की हरकतें कर रहा है. वह मुझे कुछ और बनाना चाहते थे. मैं कुछ ओर बनना चाहता था. इसलिए अगर वह नाराज भी होते तो वाजिब था गलत नहीं, लेकिन उनकी जल्दी ही स्वीकार्यता मुझे मिल गई. शायद उसका कारण यह रहा होगा कि मैं माता-पिता का इकलौता बेटा था. आप यूं कह सकते हैं की लाडला बेटा बिगड़ा हुआ था, लेकिन मैं समझता हूं कि अगर किसी व्यक्ति में अकल और हौसला है, तो उसे वही करना चाहिए जो वह करना चाहता है. चाहे कितनी भी मुश्किल आए.

दिलीप कुमार ने निजाम को बुलाया

निजाम साहब का सिर्फ साहित्य जगत में ही नहीं बॉलीवुड में भी बड़ा नाम था. इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जोधपुर में बरसों पहले एक सिनेमा घर का उद्घाटन होना था. इसके लिए मशहूर अभिनेता दिलीप कुमार को आमंत्रित किया गया, लेकिन दिलीप कुमार ने आयोजकों से साफ कहा कि वह तभी कार्यक्रम में आएंगे, जब उस प्रोग्राम की सदारत (अध्यक्षता) निजाम साहब करेंगे.प्रचार और प्रसिद्धि से दूर रहने वाले निजाम साहब ने दिलीप कुमार के कहने पर प्रोग्राम में शिरकत की थी.

स्कूटर पर घर आते गुलजार

मशहूर गीतकार साहित्यकार गुलजार शीन काफ निजाम के अच्छे मित्र हैं, जब भी जोधपुर आते हैं, तो निजाम साहब के घर जरूर जाते हैं. निजाम जोधपुर के भीतरी शहर के इलाके की एक संकरी गली में रहते हैं. एक बार गुलजार जोधपुर आए, तो वह शहर के एक 5 स्टार होटल में ठहरे थे. निजाम साहब से मिलने के लिए भीतरी शहर में पहुंचे. उनको अपनी कार छोड़नी पड़ी और स्कूटर से गुलजार उनके घर पहुंचे थे.

पद्मश्री मिलना एक जिम्मेदारी

उन्होंने फारसी के बड़े नाम ‘मीर तकी मीर’ और ‘मिर्जा गालिब’ पर बहुत काम किया है. उनके पुत्र बृजेश अंबर भी शायर हैं. सरकार की उनको पद्मश्री देने की घोषणा से सूर्यनगरी जोधपुर ही नहीं पुरे उर्दू जगत में खुशी की लहर है. पद्मश्री मिलने की घोषणा के बाद निजाम ने कहा कि कोई इस तरह का सम्मान आपको मिलता है, तो आपके ऊपर जिम्मेदारी का पहला जिम्मा शुरू होता है. इसका मतलब है. अब आप जो लिखे और करें. हम इस उम्मीद के साथ उसे देखें कि आपने कुछ अच्छा किया होगा और आगे आप और अच्छा करेंगे यह जिम्मेदारी आपके ऊपर है. पहले आपने अच्छा लिखा और अब आप कूड़ा लिखें और इसे मान लिया जाए कि यह अच्छा है. पदम श्री से यह लाइसेंस नहीं मिलता कि आप जो भी लिखेंगे अच्छा ही होगा.

संवेदना-संस्कृति एक ही है

उर्दू भाषा ही क्यों के सवाल पर वह कहते हैं कि हर व्यक्ति को किसी न किसी भाषा में रुचि होनी ही चाहिए, जब आप कविता लिखते हैं तो मुहावरे की महक उसमें शामिल होती है और जब मुहावरे की महक होती है, तो आपके सामने यह मसला नहीं होता कि वह किस भाषा में है. इसलिए ऐसे कई लेखक हैं, जिनकी मूल भाषा कुछ और है, लेकिन वह लेखन किसी ओर भाषा में करते हैं. लेखन में ईमानदारी जरूरी है न की भाषा में, आपका चाहे धर्म एक न हो, लेकिन आपकी संवेदना एक है और अगर आपकी संवेदना एक है तो आपकी संस्कृति भी एक है. हिंदू हो या मुसलमान सिख हो या हो इसाई इससे कोई फर्क नहीं पड़ता.

निजाम की मशहूर किताबें

उनकी शायरियों की कई किताबें हैं, जिनमें लम्हों की सलीब, नाद, दश्त में दरिया, साया कोई लम्बा नहीं था, सायों के साये में, बयाजे खो गई है, गुमशुदा दैर की गूंजती घंटियां, रास्ता ये कहीं नहीं जाता, और भी है नाम रस्ते का.. जैसी कई किताबें प्रकाशित हुईं. वहीं तनकीद यानी आलोचना में तज़्किरा, मुआसिर शो रा-ए-जोधपुर, मंटो-एहतिजाज और अफसाना, लफ्ज दर लफ्ज मा नी दर मा नी, संपादित पुस्तकें गालिबयात और गुप्ता रिजा, भीड़ में अकेला, दीवाने-गालिब हैं. उर्दू शायरों की 05 पुस्तकें जो नन्दकिशोर आचार्य के साथ संपादित की गईं. इसके अलावा कई लेख जो राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार में पढ़े गए और प्रकाशित हुए. साहित्यिक पत्रिकाएं भी शामिल हैं.

निजाम को मिले ये सम्मान

शीन काफ निजाम को कई पुरस्कार एवं सम्मान मिले, जिसमें राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित, साहित्य अकादमी अवार्ड 2010, राष्ट्रीय इकबाल सम्मान 2006-07, राष्ट्रीय भाषा भारती सम्मान केन्द्रीय भाषा संस्थान मैसूर, बेगम अख्तर गजल अवार्ड 2006, रामानन्द आचार्य सप्त शताब्दी महोत्सव समिति काशी द्वारा सम्मानित, राजस्थान उर्दू अकादमी जयपुर के सर्वोच्च सम्मान महमूद शीरानी अवार्ड, मेहरानगढ़ म्यूजियम ट्रस्ट द्वारा मारवाड़ रत्न एवं राजा मानसिंह सम्मान, शाने-उर्दू अवार्ड,आचार्य विद्यानिवास मिश्र स्मृति सम्मान और संस्कृति सौरभ सम्मान कोलकता शामिल हैं.

निजाम पर लेख साहित्यकार के विचार

निजाम साहब के काव्य में एक और बात मुझे खासतौर पर आकर्षित करती है. वह उसमें भावना और विचार का विलक्षण सामंजस्य है. सीधा-सादा मानवीय सत्य कितना बड़ा चमत्कार होता है. यह वह जानते हैं और उसी को अपने भीतर से पाना. उसी को दूसरे के भीतर उतार देना उनका अभीष्ट है. नन्दकिशोर आचार्य कहते है कि निजाम एक भारतीय कवि हैं, लेकिन उन की कविता राष्ट्रीयताओं, धार्मिक आस्थाओं और भाषाओं को भेद कर उस सार तत्व को अनुभव करना चाहती हैं, जो मानव जाति ही नहीं, सृष्टि मात्र को धारण करता है.

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