मध्य प्रदेश के इस गांव में न बिजली पहुंची, न ही बन पाई सड़क… आटे के लिए लोग चलते हैं 25KM

R. S. Mehta
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मध्य प्रदेश के छतरपुर में एक ऐसा गांव मौजूद है, जहां पर आजादी से लेकर अब तक बिजली नहीं पहुंची. यहां के लोगों को अपने पेट की आग बुझाने के लिए गेहूं पिसवाने के लिए भी 25 किलोमीटर दूर जाना पड़ता है. यहां के बच्चे अंधेरे में पढ़ाई करने को मजबूर हैं. जब सौर ऊर्जा से बनने वाले सोलर पैनल से मिलने वाली टिमटिमाती लाइट मिलती है तो बहुत सारे बच्चे एक जगह इकट्ठे होकर ग्रुप स्टडी करते हैं.

इस गांव का नाम ढोडन है, जिसकी आबादी एक हजार से ज्यादा है, लेकिन फिर भी यहां रहने वाले आदिवासी परिवार के लोगों को मूलभूत सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं. इतना ही नहीं इस गांव के लोग शौच क्रिया के लिए खुले में जाने को मजबूर हैं. यहां की आदिवासी महिलाएं बताती हैं कि उनके गांव में बिजली न हो पाने की वजह से गेहूं भी नहीं पिसता और गेहूं पिसवाने के लिए उन्हें 25 किलोमीटर दूर बमीठा जाना होता है. इसमें भी परेशानियों का सामना करना पड़ता है क्योंकि इस गांव का रास्ता भी सुगम नहीं है. यही वजह है कि इस गांव तक आने वाली यात्री बस भी कई सालों पहले बंद हो चुकी है.

200 सौर ऊर्जा प्लेट वितरित की गई

अब इन लोगों को गांव से बाहर जाने के लिए गांव के चार पहिया वाहनों का सहारा लेना पड़ता है. इसमें भी उन्हें डबल किराया देने पड़ता है. इसके साथ ही इस गांव की महिलाएं आज भी चूल्हे पर लकड़ी से खाना पकाती हैं. त्योहार के समय पुड़िया तलकर कुछ पकवान बनाकर खुशियां मना लेते हैं. वैसे कहने के लिए तो इनके जीवन में उजाला लाने के लिए शासन की ओर से 200 सौर ऊर्जा प्लेट वितरित की गई थी, जो हर घरों के आंगन में लगी हुई दिखाई दी, लेकिन उसकी रोशनी पूरी नहीं होती. इसलिए लोगों को रात के वक्त तेल का दीपक जलाकर उजाला करना पड़ता है और जब बच्चे पढ़ाई करने बैठते हैं तो उन्हें अंधेरे में ही पढ़ाई करनी होती है.

केन बेतवा लिंक योजना का केंद्र

गांव के लोग बताते हैं कि लाइट न मिल पाने की वजह से वह लोग सुकून की जिंदगी नहीं बिता पा रहे हैं. बच्चे भी ठीक से पढ़ाई नहीं कर पाते और रात के वक्त डर भी बना रहता है कि कहीं कीड़े मकोड़े काट न लें. केन बेतवा यह अब सिर्फ दो नदियों के नाम नहीं रह गए हैं, बल्कि नदियों को विकास से जोड़ने की परियोजना है. ढोडन गांव इस केन बेतवा लिंक परियोजना का केंद्र हैं. भारत सरकार की इस केन बेतवा लिंक परियोजना के तहत इस गांव के डूबने की नियति साल 1995 में ही तय हो चुकी थी. 25 दिसंबर साल 2024 को देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विश्व पर्यटन नगरी खजुराहो में इस प्रोजेक्ट की आधारशिला रखी. इस योजना की लागत लगभग 44 हजार करोड़ रुपए है.

विस्थापित होंगे 7000 परिवार

इस योजना से मध्य प्रदेश के छतरपुर और पन्ना जिलों के 21 गांव डूब जाएंगे और लगभग 7000 परिवार विस्थापित होंगे. केंद्र सरकार का ऐसा दावा है कि इस प्रोजेक्ट से मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के 13 जिलों को इसका फायदा मिलेगा. 11 लाख हेक्टेयर जमीन में सिंचाई की सुविधा मिलेगी. 62 लाख लोगों को पीने का पानी मिलेगा. इतना ही नहीं 100 मेगावाट से ज्यादा बिजली का सृजन होगा. फिर आखिरकार इस परियोजना का विरोध क्यों हो रहा है. यहां के आदिवासी लोग कहते हैं कि सरकार हमें जो मुआवजा दे रही है. वह उचित नहीं है. 12.5 लाख से आज की महंगाई में होता ही क्या है.

दो तरह की स्कीम बनाई गई

छतरपुर के कलेक्टर पार्थ जायसवाल का कहना है कि इस गांव के लोगों के लिए दो तरह की स्कीम बनाई गई है. पहले स्कीम यह है कि यहां के लोगो को 18 साल से ज्यादा उम्र वाले हर व्यक्ति को 12.5 लाख रुपए दिया जाएगा. फिर घर में भले ही संख्या कितनी भी हो और अगर कोई मकान लेना चाहता है तो उसे एक सिंचाई कॉलोनी डेवलप करके मकान दिया जाएगा. इसके साथ ही 7 लाख रुपए दिए जाएंगे. इसके अलावा खेती की जमीन का एकड़ के हिसाब से अलग से मुआवजा दिया जाएगा. इस कार्य की प्रक्रिया चल रही है. सभी लोगों को संतुष्ट करने का प्रयास लगातार किया जा रहा है.

घर तक आने के लिए साधन नहीं

हालांकि ढोडन गांव के गौरी शंकर यादव कुछ और ही बताते हैं. उनके मुताबिक सरकार द्वारा दिया जा रहा पुनर्वास पैकेज जीवन यापन और विस्थापन से उभरने के लिए पर्याप्त नहीं है. गौरी शंकर ने कहा कि हम लोगों की जिंदगी बहुत मुश्किलों में बीती है. अब हमारे बच्चों की जिंदगी हम लोगों जैसी न हो. इसलिए सरकार को ठोस कदम उठाने चाहिए. हमें अब तक सुगम रास्ता नहीं मिला. घर तक आने के लिए सही साधन नहीं मिला. कम से कम अब मुआवजा तो सही मिले.

वन क्षेत्र में आता है ढोडन गांव

वहीं अगर अधिकारियों की मानें तो ढोडन गांव पन्ना नेशनल पार्क के वन क्षेत्र में आता है, जिसकी वजह से यहां पर बिजली पहुंचना संभव नहीं हो पाई. इसीलिए सोलर प्लेट देकर उजाला करने की कोशिश की गई थी. बच्चों की शिक्षा की बात करें तो यहां पर माध्यमिक शाला है और रास्ता सुगम नहीं है. इसके अलावा जानवरों का भी डर रहता है. इसके कारण यहां के लोग ज्यादा पढ़ाई नहीं कर पाते हैं. आज भी यहां माध्यमिक शाला में पढ़ने के लिए मात्र 50 बच्चे ही आप आते हैं और यहां के बच्चों को पढ़ाने के लिए जो टीचर आते हैं. उन्हें एक हफ्ते तक इसी गांव में रुकना होता है और जब छुट्टी का दिन होता है, तब वह अपने घर पहुंच कर परिवार के साथ समय बिता पाते हैं.

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