दिल्ली चुनाव: प्रवासियों के हाथों में सत्ता की चाबी, कैसे बने राजधानी में ‘बाहुबली’ वोटबैंक?

R. S. Mehta
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दिल्ली में इस बार का विधानसभा चुनाव बहुत ही रोचक बनता जा रहा है. दिल्ली की सत्ता पर काबिज होने के लिए सियासी दलों ने जातीय और धार्मिक बिसात बिछाने से ज्यादा क्षेत्रीय समीकरण साधने का दांव चला है. रोजी-रोटी और रोजगार की तलाश में देशभर के लोग राजधानी में आकर बसे हैं. देश के अलग-अलग राज्यों से आए प्रवासी दिल्ली की सियासत के ‘बाहुबली’ माने जाते हैं, जो सत्ता की दशा और दिशा तय करने की ताकत रखते हैं.

दिल्ली की सियासत में न ही किसी जाति का पूरी तरह दबदबा है और न ही एक धर्म का वर्चस्व है. सियासी मिजाज और वोटिंग पैटर्न देश के दूसरे राज्यों से काफी अलग है. रोजगार की तलाश में दिल्ली में रह रहे प्रवासियों का सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक तौर पर सबसे ज्यादा लगाव और जुड़ाव अपने इलाके के लोगों से होता है. अहम बात यह कि ऐसे लोग एक ही इलाके में रहना भी पसंद करते हैं और चुनाव के दौरान सियासी दल इसी पहचान को खाद-पानी देकर वोट में तब्दील करने की बिसात बिछाते हैं.

दिल्ली में 70 फीसदी प्रवासी वोटर

देश की राजधानी में 70 फीसदी से ज्यादा वोटर प्रवासी हैं, जो अलग-अलग राज्यों से आकर बसे हैं. ये किसी भी दल का खेल बनाने और बिगाड़ने की ताकत रखते हैं. दिल्ली में पूर्वांचली, पंजाबी, उत्तराखंडी, हरियाणा, वेस्ट यूपी, मध्य प्रदेश, बुंदेलखंड और दक्षिण भारत के लोग बड़ी संख्या में रहते हैं, जो राजधानी की 70 में से 55 से ज्यादा सीटों को प्रभावित करते हैं. यही वजह है कि दिल्ली चुनाव में सियासी दल दूसरे राज्यों से ताल्लुक रखने वाले लोगों को अपने पक्ष में करने का दांव चल रहे हैं.

दिल्ली में प्रवासी वोटर ‘बाहुबली’

आजादी के बाद देश का बंटवारा हुआ तो पाकिस्तान से बड़ी संख्या में आए पंजाबी समाज के लोगों को दिल्ली के अलग-अलग हिस्सों में बसाया गया था, जिसमें पंजाबी, खत्री और सिख समुदाय के लोग शामिल थे. दिल्ली में करीब 20 फीसदी पंजाबी समाज के वोटर हैं, जिसमें चार फीसदी सिख वोटर्स भी है. पंजाबी समाज ने लंबे समय तक दिल्ली की सियासत को अपने हाथों में रखा था, लेकिन एशियाड गेम और उसके बाद उदारीकरण ने दिल्ली की राजनीति पर भी अपना असर डाला.

सत्तर-अस्सी के दशक में एशियाड गेम के लिए दिल्ली को संवारने का काम हुआ तो बड़ी संख्या में लोग देश के अलग-अलग हिस्सों से आए थे, जो बाद में बस गए. इसके बाद नब्बे के दशक में उदारीकरण की बुनियाद रखी गई तो दिल्ली में बहुत बड़ी संख्या में यूपी, बिहार, उत्तराखंड, दक्षिण भारत सहित दूसरे राज्यों के लोग रोजगार के लिए आए, जो बाद में दिल्ली और आसपास के इलाके में बस गए.

दिल्ली में करीब 90 फीसदी निर्माण मजदूर बुंदेलखंड, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ से हैं. रेहड़ी-पटरी व ट्रांसपोर्ट सेक्टर पर पूर्वांचल के लोग काबिज हैं. ढाबे पर काम करने वालो की अधिकतर तादाद उत्तराखंड के लोगों की है तो झारखंड, असम और बंगाल के लोग घरेलू काम में लगे हुए हैं. दिल्ली के कारोबार पर पंजाबी समाज का दबदबा है तो कॉरपोरेट में भी यूपी और बिहार के लोग बड़ी संख्या में है. इसके चलते पूर्वांचली मतदाता दिल्ली की राजनीति के धुरी बने हुए हैं. दिल्ली की सत्ता की दशा और दिशा को प्रवासी मतदाता तय करते हैं.

दिल्ली में पंजाबी वोटों की सियासत

पंजाबी वोटर एक समय दिल्ली में सत्ता के असल किंग माने जाते थे. मदन लाल खुराना, शीला दीक्षित और सुषमा स्वराज को सत्ता की बागडोर मिली, जो पंजाबी समाज से आते हैं. विकासपुरी, राजौरी गार्डन, हरी नगर, तिलक नगर, जनकपुरी, मोती नगर, राजेंद्र नगर, ग्रेटर कैलाश, जंगपुरा, कालका जी और गांधी नगर सीट पर पंजाबी समुदाय जीत हार तय करते हैं.

कांग्रेस से लेकर बीजेपी और आम आदमी पार्टी पंजाबी वोटों को लुभाने में जुटी है, जिसके लिए उनके ही समाज के उम्मीदवार भी उतारे हैं. पंजाबी समुदाय से आम आदमी पार्टी ने 2, बीजेपी ने 5 और कांग्रेस ने 7 प्रत्याशी उतारे हैं. सिख समुदाय से AAP ने 4, बीजेपी ने 3 और कांग्रेस ने चार प्रत्याशी उतारे हैं. इसके अलावा कांग्रेस ने एक पंजाबी मुस्लिम को भी टिकट दिया है.

पूर्वांचलियों के हाथ में सत्ता की चाबी

दिल्ली में करीब 25 फीसदी पूर्वांचली मतदाता हैं, जिसमें यूपी और बिहार से आए हुए लोग हैं. पूर्वांचली दिल्ली में करीब 24 सीटों पर सियासी असर रखते हैं. किराड़ी, बुराड़ी, उत्तम नगर, संगम विहार, बादली, गोकलपुर, मटियाला, द्वारका, नांगलोई, करावल नगर, विकासपुरी, सीमापुरी, मॉडल टाउन, पटपड़गंज, लक्ष्मी नगर, बदरपुर, पालम, राजेंद्र नगर और देवली सीट है.

2020 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने पूर्वांचल बहुल इलाके की ज्यादातर सीटें जीती थीं, जबकि बीजेपी के खाते में चार से पांच सीटें आई थी. दिल्ली विधानसभा चुनाव में इस बार पूर्वांचली उम्मीदवारों की लिस्ट देखें तो आम आदमी पार्टी ने 12 टिकट दिए हैं तो बीजेपी ने 6 और कांग्रेस ने 3 पूर्वांचली प्रत्याशी उतारे हैं. दिल्ली में लाल बिहारी तिवारी, महाबल मिश्रा और मनोज तिवारी पूर्वांचली चेहरे माने जाते हैं.

उत्तराखंडी और साउथ वोटर कितने अहम

दिल्ली की आबादी में बड़ी हिस्सेदारी उत्तराखंड से आए लोगों की भी है. उत्तराखंड के करीब 5 फीसदी मतदाता दिल्ली में हैं और दस सीटों पर चुनावी गेम बनाने और बिगाड़ने की ताकत रखते हैं. नई दिल्ली, आरके पुरम, दिल्ली कैंट, बुराड़ी, करावल नगर, पटपड़गंज, बदरपुर, लक्ष्मी नगर, पालम और द्वारका सीट पर उत्तराखंडी वोटर निर्णायक रोल अदा करते हैं.

बीजेपी से लेकर कांग्रेस और आदमी पार्टी तक उत्तराखंड के प्रवासियों को साधने की कवायद में है, जिसके लिए बीजेपी ने दो और कांग्रेस ने एक उत्तराखंड को प्रत्याशी बनाया है जबकि छह प्रत्याशी निर्दलीय या फिर अन्य दल से हैं. दिल्ली में बड़ी संख्या में लोग दक्षिण भारत के भी है, जिनको साधने के लिए पार्टियां तमाम जतन कर रही है. बाहरी दिल्ली के इलाके में हरियाणा से ताल्लुक रखने वाले भी आकर बसे हैं, जो खासकर गुरुग्राम और बहादुरगढ़ से लगे हुए दिल्ली के इलाके में रहते हैं.

दिल्ली में प्रवासी किसका देंगे साथ

दिल्ली की सियासत में प्रवासी मतदाताओं को अपने पक्ष में करने की जुगत में सभी पार्टियां जोर लगा रही हैं. यही वजह है कि राजनीतिक दलों के यूपी, बिहार, हरियाणा व पंजाब के नेता दिल्ली के पूर्वांचली, दिल्ली देहात और पंजाबी बहुल इलाकों में प्रचार के दौरान दिख जाते हैं. बेशक उत्तर भारत के राज्यों के वोटर दिल्ली में प्रभावी हैं, लेकिन दिल्ली के अलग-अलग क्षेत्र में जम्मू कश्मीर से लेकर तमिलनाडु और गुजरात से लेकर उत्तर-पूर्वी भारत के लोग रहते हैं. यही वजह है कि पंजाब से लेकर यूपी और बिहार तक के नेताओं को प्रचार के लिए लगा रखा है. ऐसे में देखना है कि प्रवासी वोटरों का विश्वास कौन जीत पाता है.

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