दिल्ली चुनाव में कांग्रेस की असली विपक्ष AAP क्यों? इन 5 आंकड़ों में छिपा है राज

R. S. Mehta
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8 महीने बाद ही दिल्ली के चुनाव में आम आदमी पार्टी के खिलाफ पूरी मजबूती से कांग्रेस ने मैदान संभाल लिया है. कांग्रेस जहां बड़े चेहरे को उतारकर जमीन पर आम आदमी पार्टी की घेराबंदी कर रही है. वहीं गारंटी के जरिए उसके योजनाओं को भी विफल करने में जुटी है. दोनों पार्टियों की तनातनी यहां तक बढ़ चुकी है कि गुरुवार को आप मुखिया अरविंद केजरीवाल ने कांग्रेस और बीजेपी में पर्दे के पीछे से समझौते का आरोप लगा दिया.

दरअसल, अशोक गहलोत ने एक इंटरव्यू में कहा था कि दिल्ली चुनाव में कांग्रेस की असली लड़ाई आम आदमी पार्टी से है. आप कांग्रेस की विपक्षी पार्टी है.

इतना ही नहीं, आप के खिलाफ कांग्रेस की मजबूती मोर्चेबंदी की वजह से इंडिया गठबंधन में टूट शुरू हो चुकी है. तृणमूल और सपा जैसे कई दलों ने इस लड़ाई में कांग्रेस के मुकाबले आप को समर्थन देने की बात कही है. इन सभी सियासी घटनाओं के इतर सवाल यह है कि आखिर कांग्रेस ने आप के खिलाफ मजबूती से मैदान में उतरने का फैसला क्यों लिया है?

इन 5 आंकड़ों में छिपा है राज

दिल्ली के चुनावी रण में पहले कांग्रेस आम आदमी पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ना चाह रही थी, लेकिन अरविंद केजरीवाल ने किसी के साथ गठबंधन नहीं करने की बात कही. आप की इस घोषणा के बाद कांग्रेस हाईकमान के साथ दिल्ली, पंजाब और गुजरात से जुड़े नेताओं की बैठक हुई. इसी बैठक में केजरीवाल के खिलाफ मजबूत लामबंदी का प्लान तैयार किया.

इस प्लान के पीछे 5 आंकड़े को अहम वजह बताया जा रहा है. कहा जा रहा है कि इन्हीं आंकड़ों ने कांग्रेस को दिल्ली में मजबूती से लड़ने के लिए मनोवैज्ञानिक तौर पर तैयार किया. इस स्टोरी इन्हीं 5 आंकड़ों को डिटेल में जानिए…

1. दिल्ली और पंजाब में आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस से ही सत्ता छिनी. 2013 में आप का पूरा कैंपेन कांग्रेस हाईकमान और दिल्ली के मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के खिलाफ था. 2013 में जब दिल्ली चुनाव के जब नतीजे आए, तो किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिल पाई. इस चुनाव में बीजेपी को 32, कांग्रेस को 8 और आप को 28 सीटों पर जीत मिली. एक सीट पर निर्दलीय और एक पर जेडीयू ने जीत दर्ज की थी.

2013 के चुनाव में 29 प्रतिशत वोट आप को मिले. बीजेपी को 33 और कांग्रेस को 24 प्रतिशत वोट इस चुनाव में मिला. कांग्रेस ने विधायकों के दबाव में आप को समर्थन दे दिया, लेकिन 49 दिन बाद ही अरविंद केजरीवाल ने इस्तीफा दे दिया. इसके बाद कांग्रेस का ग्राफ लगातार गिरता गया.

2015 के चुनाव में भले ही बीजेपी को 3 सीटों पर जीत मिली, लेकिन उसके वोटों में सिर्फ 0.8 प्रतिशत की गिरावट देखी गई. वहीं कांग्रेस का वोट 24 से 9 प्रतिशत पर लुढ़क गया. इस चुनाव में कांग्रेस के वोटर्स आप की तरफ शिफ्ट हो गए. 2020 के चुनाव में भी यही मजमून था.

इसी तरह पंजाब में भी आप ने कांग्रेस से सत्ता छिन ली. पंजाब में भारतीय जनता पार्टी काफी कमजोर स्थिति में है. कांग्रस का मानना है कि अगर अभी मजबूती से नहीं लड़ा गया तो इसका खामियाजा आने वाले चुनाव में और ज्यादा उठाना पड़ सकता है. पंजाब में एंटी इनकंबेंसी वोट कांग्रेस को फिर कभी नहीं मिल पाएंगे.

2. साल 2022 में गुजरात और गोवा के चुनाव में कांग्रेस को बढ़िया परफॉर्मेंस की उम्मीद थी, लेकिन आप ने दोनों जगहों पर कांग्रेस का खेल खराब कर दिया. 2017 के गुजरात चुनाव में कांग्रेस को 77 सीटों पर जीत मिली थी, जबकि बीजेपी को 99 पर. 2022 में कांग्रेस की सीट 17 पर पहुंच गई.

गुजरात में कांग्रेस को 77 से 17 पर पहुंचाने में आप ने बड़ी भूमिका निभाई. गुजरात चुनाव में जहां आप को 5 सीटों पर जीत मिली. वहीं पार्टी के उम्मीदवार 30 सीटों पर दूसरे स्थान पर रहे. चुनाव में आप को 12.9 प्रतिशत वोट मिले. वहीं कांग्रेस 27 प्रतिशत वोटों पर सिमट गई. 2017 में कांग्रेस को 40 प्रतिशत मत मिले थे.

2017 के मुकाबले 2022 में बीजेपी के वोटों में कोई फर्क नहीं आया. ऐसे में कहा गया कि आप को जो वोट गुजरात में मिले हैं, वो कांग्रेस के हैं. गोवा और जम्मू कश्मीर में भी आप ने ही कांग्रेस को नुकसान पहुंचाया. गोवा में बीजेपी और कांग्रेस के बीच तो सीधा मुकाबला था.

3. पंजाब, गोवा, गुजरात, कश्मीर और दिल्ली में जहां आप की वजह से कांग्रेस सियासी नुकसान झेल चुकी है. वहीं पार्टी को भविष्य में असम जैसे राज्यों में भी नुकसान का डर है. असम में अभी तक कांग्रेस की सीधी लड़ाई बीजेपी से है. असम में आप धीरे-धीरे पैर पसारने में जुटी है.

2022 के गुवाहाटी निकाय चुनाव में आप ने 10 प्रतिशत वोट हासिल किए थे. आप यहां लगातार अपना संगठन मजबूत कर रहा है. आप की नजर 2026 के असम विधानसभा चुनाव पर है. कांग्रेस को डर है कि अभी मजबूती से नहीं लड़ा गया तो फ्रेंटली फाइट का फायदा आप असम में उठा सकती है.

4. आप के खिलाफ मजबूती से लड़ने की एक वजह कांग्रेस का इतिहास भी है. साल 2000 तक बिहार में कांग्रेस पार्टी आरजेडी के खिलाफ मुखर भूमिका में थी, लेकिन 2000 में आरजेडी को कांग्रेस ने समर्थन कर दिया. इसके बाद बिहार की सियासत से कांग्रेस लगभग साफ हो गई.

अभी भी कांग्रेस यहां आरजेडी पर ही निर्भर है. इसी तरह 2011 चुनाव में कांग्रेस पश्चिम बंगाल में ममता के साथ गठबंधन कर मैदान में उतरी थी. सत्ता में आने के बाद ममता ने कांग्रेस को किनारे कर दिया. 2021 के चुनाव में तो कांग्रेस ने ममता के लिए मैदान ही खाली छोड़ दिया.

अब कांग्रेस बंगाल में जीरो पर सिमटी हुई है. यहां भविष्य में भी पार्टी के लिए कोई संभावनाएं नहीं दिख रही है. दूसरी तरफ ममता बनर्जी भी कांग्रेस को कई मौकों पर आंख दिखा चुकी है.

5. आप के खिलाफ मजबूती से लड़कर कांग्रेस समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल जैसे सहयोगियों को भी संदेश देना चाह रही है. दिल्ली चुनाव में मजबूती से लड़ने का अगर कांग्रेस को फायदा होता है तो बिहार चुनाव 2025 और यूपी चुनाव 2027 में कांग्रेस को सहयोगी भाव दे सकते हैं.

यूपी और बिहार जैसे राज्यों में कांग्रेस लंबे वक्त से अपने खोई हुई जमीन वापस पाने की जद्दोजहद में जुटी है.

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